<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-6996085666643607964</id><updated>2011-09-08T11:11:35.613-07:00</updated><title type='text'>daudnagar</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://daudnagar.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>SUJIT CHOWDHURY</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13467435738041572234</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SbJ8HC2BcgI/AAAAAAAAAB8/gar-VF_uQEU/S220/IMG_0134.JPG'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>12</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6996085666643607964.post-6770448760380267813</id><published>2010-05-19T04:32:00.000-07:00</published><updated>2010-05-19T04:35:23.067-07:00</updated><title type='text'>ताड़पोश .. ताड़पोश.. और उस्ताजी पूजा</title><content type='html'>दाउदनगर(औरंगाबाद) ताड़ी की बहार आ गई है। जगह जगह ताड़ीखाने गुलजार होने लगे है। इस मौसम में घनी आबादी के बीच लगे ताड़ वृक्षों पर चढ़ते हुए पासी हांक लगाता है- ताड़पोश.. ताड़पोश..। दरअसल विनोद चौधरी के अनुसार यह स्त्री का मान रखने की कोशिश है। पासी जब ताड़ के पेड़ पर चढ़ते है तो वह इतनी ऊंचाई पर होते है कि समीप के दर्जनों घरों की छतें और आंगन उन्हे स्पष्ट नजर आते है। महिलाओं को सचेत करने के लिए हांक लगाया जाता है। ताड़ी बेचने की धंधे की शुरूआत उस्ताजी पूजा से ही होती है। अब इस पूजा की परंपरा कब से है, कोई नहीं जानता लेकिन अमल में अब भी है। हर चौधरी जो ताड़ी बेचने का धंधा करता है ताड़ी उतारने का काम शुरू करने के पहले सामूहिक पूजा में शामिल होता है। दाउदनगर की परंपरा में शाकाहार पूजा है जबकि देहाती क्षेत्रों में यह पूजा मांसाहारी होती है। लोग खस्सी काटते है और खाते पीते है। यहां शुद्ध दूध का खीर वह भी बिना चीनी या गुड़ का बनता है। गुड़ की मिठाई चढ़ाई जाती है और साथ में ताड़ी दारू इष्टदेव के नाम पर जमीन पर गिराया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से इष्टदेव खुश होते है और ताड़ के पेड़ से गिरने पर चौधरी को नुकसान कम होता है। इलाके में यह मान्यता है कि ताड़ के पेड़ से गिरते वक्त चौधरी के कमर में खोंसा हुआ हसुली स्वत: पहले गिर जाता है ताकि उससे चौधरी की जान को खतरा न हो। यह हसुली काफी तेज धार वाला होता है। इतना तेज धार का दूसरा हथियार बाजार में नहीं मिलता। फिलहाल पूजा पाठ की परंपरा के बाद अपने परंपरागत पेशे में यह चौधरी या पासी समाज उतरता है और अपना आय शुरू करता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6996085666643607964-6770448760380267813?l=daudnagar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daudnagar.blogspot.com/feeds/6770448760380267813/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2010/05/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/6770448760380267813'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/6770448760380267813'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='ताड़पोश .. ताड़पोश.. और उस्ताजी पूजा'/><author><name>SUJIT CHOWDHURY</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13467435738041572234</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SbJ8HC2BcgI/AAAAAAAAAB8/gar-VF_uQEU/S220/IMG_0134.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6996085666643607964.post-2818479485536245840</id><published>2010-04-01T02:08:00.000-07:00</published><updated>2010-04-01T02:17:12.446-07:00</updated><title type='text'>मैट्रिक की परीक्षा या अग्नि परीक्षा ?</title><content type='html'>&lt;span style="color:#333300;"&gt;&lt;span style="font-family:arial;"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#666600;"&gt;मित्र कौशल ने बताया की बिहार में मैट्रिक की परीक्षा शुरू हो गयी है और इस वर्ष तकरीबन दस लाख विद्यार्थी परीक्षा दे रहे हैं. चुंकी वे बिहार बोर्ड से पास नहीं कियें हैं इसलिए उन्हें ' मैट्रिक परीक्षा का आँखों देखा अनुभव नहीं है. उन्होंने आग्रह किया की मैं कुछ अपनी स्मृतियों को बाटूँ . खैर सबों का अपना अपना व्यक्तिगत और वैयक्तिक अनुभव होता है और शायद उससे तात्कालिक परिस्थिति का एक आंकड़ा मिले. ऐतिहासिक रूप से बिहार में शिक्षण व्यवस्था का कुछ विश्लेषण हो सके. हैं, स्पष्ट रूप से इस विश्लेषण की जिम्मेदारी मैं मित्र कौशल पर सौपता हूँ. कौशल जी ने एक महत्वपूर्ण बात कही की यह परीक्षा विद्यार्थियों के लिए ' rites de passage ' होता है. खैर, उन्होंने स्मृतियों के ' labyrinth ' में इस 'passage ' को ढूँढने की जिम्मेदारी दी है तो मन घटनाओं से ज्यादा उन अनुभूतियों को याद करता है.&lt;br /&gt;बात सत्तर के दशक की कर रहा हूँ. मैट्रिक की परीक्षा आज की तरह नहीं होती थी. आज, जैसे बच्चे परेशान रहते हैं, परीक्षा से ज्यादा अपने पिता-माता की अपेक्षाओं से, माता पीछे पड़ती हैं तो पिता झुंझलाए-बौखलाए से रहते हैं. जैसे एक दौड़ हो रही हो . हाँ हमारे समय में माहौल बदल जाता था. शिक्षक समुदाय की प्रतिस्था बढ जाती थी और headmaster लोगों का दबदबा ऊँचा हो जाता था, पुलिस महकमे में बंदोबस्त की शुरुआत हो जाती थी. उसी बीच बिचौलिए भी उभर कर आते थे जो परीक्षा में पास करवाने का ठेका लेते थे. सुनता था की पैसा देने पर परीक्षा कोई और दे सकता है (impersonation ) या एक स्पेशल रूम में परीक्षा होगी जहाँ हरेक तरह की छूट मिलेगी on -line dictation के साथ . मैं यह एक कस्बाई अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ. खैर शायद परिस्थिति ज्यादा नहीं बदली. सुना की मेरे जान -पहचान के एक शिक्षक जो बाद में headmaster बन गए थे वे पकडे गए ; उनके घर कॉपियां लिखी जा रही थी तेज लिखने वाले professionals द्वारा हाँ , फर्क यह है की पुलिस का छापा पड़ा जो शायद हमारे समय में नहीं होता था. कुछ वर्षों पहले उत्तरी बिहार के किसी जिले में हमारे एक आईएस मित्र जो जिन्होंने काफी कडाई कर रखी थी उनपर जानलेवे हमले की कोशिश भी हुई थी. उस दौर में एक भीड़ मानसिकता थी, शिक्षा पर टूटते सामंतवादी और उभरते पूंजीवादी विचारों का अपना-अपना प्रभाव था. गुंडागर्दी तो एक सार्वभौमिक सत्य था ही.&lt;br /&gt;मेरे अपने दो अनुभव हैं और मैं इसे मैं बिना INTELECUALISE (शायद मैं करने में असफल ही रहूँ) करते हुए पेश कर रहा हूँ.&lt;br /&gt;पहला अनुभव मेरे बड़े भाई के परीक्षा का. उसकी परीक्षा थी औरंगाबाद में. यह था हमारा जिला. भाई मेरा तेज था और उसके कई नखरे थे जैसे काफी (कहवा) पीना ताकि वह देर रात तक जग कर पढ़ सके. मैं उससे तो साल छोटा हूँ मगर मैं उस समय आठवें क्लास में था. एक कमरा किराये पर लिया गया आज के पेईंग गेस्ट की तरह. एक पारिवारिक मित्र जो परिवार के सदस्य की तरह थे (बाद में वह शिक्क्षक बन गए) उन्होंने सारी व्यवस्था की. मेरे नाना जी गुजर गए थे और मेरी नानी की जिम्मेदारी थी मेरे भाई की ठीक ठाक परीक्षा दिलवाने की . वही सज्जन मेरे भाई को औरंगाबाद ले गए और मैं गया साथ देने और कुछ मदद करने जैसे पानी पिलाना, कछुआ छाप जलाना, किताबें - कॉपियां ढोना आदि - आदि .मुझे अभी भी याद है की मैं चुरा-चुराकर MILKMAID चाटता था. वे हमें वहां छोड़ कर आश्वश्त होकर लौट गए यह कहकर की हरेक तीन-चार रोज पर वह आते रहेंगे. रोज मैं भाई के साथ रिक्से से स्कूल तक जाता , ब्रेक के वक़्त नाश्ता देता - पानी पिलाता ,और उसदिन की परीक्षा के बाद उसके साथ डेरा आता. सारा दिन उस गर्म दुपहरी में उस स्कूल के बाहर गुजारता: भीड़ देखते हुए, तथाकथित 'गार्जियन' पर्चे बनाते और किसी खिड़की तक पहुँचाने की कोशिश करते हुए, पुलिस लोगों को एक काल्पनिक दायरे के बाहर लाठी से खदेतते हुए. उसी भीड़ में मेरे मोहल्ले का एक लड़का मिल गया जो औरंगाबाद के किसी कॉलेज में इंटर की पदाई कर रहा था. वह अपने छोटे भाई के लिए वहां आ-जा रहा था. एक दिन उसने मुझसे कहा की चल थोडा शहर देख कर आते हैं. वह स्कूल शहर (उस समय हमारे लिए औरंगाबाद शहर ही था , उसके अलावा मैंने उस उम्र में सिर्फ गया और रांची देखा-घुमा था) से बाहर था और मैंने औरंगाबाद शहर ज्यादा देखा नहीं था. घुमते-घुमते हमने एक होटल में नाश्ता किया और फिर घूमने लगे. घुमते-घुमते वह एक गली में गया जहाँ घर की जगह छोटे छोटे कमरे थे और रंग- बिरंगे , कुछ चमकदार तो कुछ भद्दे-बेरंग पैबंद लगे परदे लटक रहे थे. दरवाजे पर औरते खडी थीं. उनके इशारे, हाव-भाव से मुझे समझते देर न लगी की यह 'रंडीखाना' है. मुझे बड़ा अटपटा लगा. वह लड़का एक कमरे की तरफ बढ़ा. मेरे पास कोई चारा नहीं था सिवाय उसके पीछे=पीछे चलने के अलावा. उसने आगे जाकर कुछ बातें की , उस औरत ने मुझे देखा और कहा,"तू भी आ जा" . मैं झेंप गया. उस लड़के ने मुझसे कहा तुम बाहर थोडा इंतजार करो मैं अभी आता हूँ. वह इंतजार, वह बेबसी और शर्म्गिन्दगी (उम्र के कारण) मैं कैसे भूल सकता हूँ. रास्ता जानता न था की लौट जाऊं. लग रहा था की मैं भटका हुआ हूँ और लोग-बाग एक अजीब नजर से देख रहे हों जैसे मैं कोई उपहास का पात्र हूँ. मगही की एक बोली है " हे धरती मैया , तू फट जा की हम समां जाईं." ऐसा ही कुछ लग रहा था मुझे. खैर पांच-दस मिनट में फारिग होकर वह बाहर निकला और कहा की पांच रूपये में बात बन गयी और मिजाज भी बन गया. तो मित्र यह था मेरा एक अनुभव जो मैट्रिक परीक्षा से जुडी है. हाँ आज से पहले मैंने यह बात किसी को भी नहीं बताई, अपने भाई को भी नहीं जो मेरे दोस्त, मेरे हमदम की तरह है. यह बात मित्र कौशल ने उगलवा ली, इस ब्लॉग के बहाने.&lt;br /&gt;दूसरा अनुभव मेरी अपनी परीक्षा की. मेरा सेंटर पड़ा औरंगाबाद से और आगे : मदनपुर. यह एक छोटी सी जगह थी: शायद ब्लाक के स्तर की. तब तक मेरी नानी को मेरी परीक्षा में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी. भाई उनका दुलारा नाती था. हाँ अपने सामर्थ्य के मुताबिक उन्होंने पैसे देने का आश्वाशन जरूर दिया. अपनी परीक्षा की व्यवस्था मेरी ही जिम्मेदारी थी. मेरा एक सहपाठी दोस्त था : कलाम. मुस्लिम और जाति का रंगरेज. उसका घर मेरे घर के पास ही था. उसके परिवार में सभी लोग , औरतें -मर्द और बच्चे 'रंगरेजी' के काम में लगे रहते . बच्चे और औरतें कपडे रंगते-सुखाते, कलफ लगाते तो बड़े उन कपड़ों पर अलग-अलग चमकीले रंगों से लकड़ी के 'ठेपों' से जिनपर तरह-तरह के डिजाईन बने रहते थे, उसकी छपाई किया करते थे. यह एक तरह का ' ब्लाक -प्रिंटिंग' था और कलाम के बड़े , संयुक्त परिवार का सारा आर्थिक आधार था: रंगरेजी. गरीब औरतें जो थोडा पैसे से सादी सूती कपडे पर रंगरेजी करवाते थे : साड़ी या . दुपट्टे बनवाते , सस्ता, सुन्दर और टिकाऊ. खासकर सारे लोग नवाब साहेब और घोड़ा साईं (जिसकी चर्चा मैंने पुराने ब्लॉग पर की थी ) के मजारों पर चढ़ने वाले चादर. यही था व्यवसाय उसके परिवार का. . यह एक बड़ा परिवार था . कलाम गरीब था मगर पढने में तेज था खासकर गणित में. वह अपने परिवार में पहला लड़का था जो मैट्रिक की परीक्षा दे रहा था. उससे परिवार को काफी उम्मीदें थीं. मैंने निर्णय लिया की कलाम के साथ ही मदनपुर में रहूँगा और परीक्षा दूंगा. मेरे परिवार को भी कोई आपत्ती नहीं हुई. इस तरह कलाम के दादा जी बन गए अभिवावक और बावर्ची. नानी ने कुछ नमकीन -कुछ मीठे बना दिए जो दस-पंद्रह दिन चल सके नाश्ते के बतौर. केरोसीन तेल के स्टोव , बर्तन, राशन अदि की व्वस्था हुई और मैं, कलाम और उसके दादा चल पड़े मदनपुर को . हम बस से मदनपुर पहुंचे और डेरा लिया किसी मुस्लिम सज्जन के घर में. शौचालय और नहाने की व्यवस्था नहीं थी. कुछ दूर पर किसी दफ्तर के आगे एक चापा कल (handpipe ) था वहां से पानी लाना पड़ता था. अहले सुबह हम वहीँ नहाया करते थे. झाड़ियों के पीछे किसी तरह शौच करना मेरे लिए एक नया तजुर्बा था. हमें पढने देने के लिए कलाम के दादा जी खुद पानी भर लाते. उनके हाथों बने पराठें और आलू की सब्जी अभी भी याद है मुझे. पहली बार मैंने चौकोना पराठा देखा और खाया था. शाम को जब थोड़ी ठंडी हवा चलती और आसमान लालियाता तो हम पास के एक वीरान से जगह पर जाते और पत्थरों पर बैठते. परीक्षा के दौरान पुलिस का बंदोबस्त तो था ही फिर भी पुर्जे अन्दर-बाहर आ-जा रहे थे. इसे हम कहते थे ' चोरी चलना' . खैर हमारे न तो तो कोई हमदर्द थे न दिलावर दोस्त-मुहीम जो मदद करते . मदद की जरूरत थी या नहीं; यह बात मैं गोपनीय ही रखता हूँ. हमारे साथ थे तो सिर्फ कलाम के दादा : अनपढ़ पर बड़े जिगर वाले जिसमे सिर्फ दुवाएं भरीं थी : कलाम और मेरे लिए.&lt;br /&gt;बरसों पहले कलाम के दादाजी अल्लाह को प्यारे हो गए, और कलाम एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षक बन गया. बहुत तंगी से गुजारा करता है अपना और अपने परिवार का जीवन. बेटा होशियार और पढ़ा-लिखा मगर बेरोजगार. रंगरेजी का काम भी कालांतर में ' बाजारीकरण' की ऐतिहासिक प्ताक्रिया में लुप्त हो गया.&lt;br /&gt;सोचता हूँ कितने अच्छे और प्यारे थे वे दिन, कितना अपनापन था. संकीर्ण सांप्रदायिक या सामाजिक - आर्थिक दुर्भावनाओं से ऊपर थी हमारी भावनाएं :&lt;br /&gt;" &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#666600;"&gt;&lt;em&gt;न दुनिया का ग़म था न रिश्तों के बंधन&lt;br /&gt;बड़ी खूबसूरत थी वो जिंदगानी,&lt;br /&gt;ये दौलत भी ले लो , ये शोहरत भी ले लो&lt;br /&gt;भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी&lt;br /&gt;मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन&lt;br /&gt;वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी&lt;/em&gt; "&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6996085666643607964-2818479485536245840?l=daudnagar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daudnagar.blogspot.com/feeds/2818479485536245840/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2010/04/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/2818479485536245840'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/2818479485536245840'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='मैट्रिक की परीक्षा या अग्नि परीक्षा ?'/><author><name>SUJIT CHOWDHURY</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13467435738041572234</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SbJ8HC2BcgI/AAAAAAAAAB8/gar-VF_uQEU/S220/IMG_0134.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6996085666643607964.post-8146919060469576385</id><published>2009-05-30T01:59:00.000-07:00</published><updated>2009-05-31T07:21:19.264-07:00</updated><title type='text'>फस्सिल में ताड़ी की बहार : कुछ बात अपनी भी</title><content type='html'>(कहते हैं देर आए दुरुस्त आए,' मित्र संजीव अव्वल तो लिखते नहीं (शायद उन्हें &lt;span class=""&gt;WRITERS &lt;/span&gt;&lt;span class=""&gt;BLOCK &lt;/span&gt;है ) मगर जब लिखते हैं तो तहे -दिल से  लिखते हैं।  उनका यह आलेख इस बात का गवाह है की वे किस्सागोई के इल्म में माहिर तो हैं ही, उतनी ही संजीदगी से वे लिखते भी हैं। मगह, ताड़ी और ताड़ी (एक &lt;span class=""&gt;METAPHOR &lt;/span&gt;के रूप में) से काफी संभावनाएं बनी हैं व्यक्तिगत और सामाजिक भावनाओं को तात्कालीन परिप्रेक्ष्य में देखने की। श्री रविश कुमार जो &lt;span class=""&gt;NDTV &lt;/span&gt;के वरिष्ट पत्रकार हैं उन्होंने दैनिक हिंदुस्तान में टिपण्णी भी की है।  मित्र संजीव ने अपने बचपन की बातों को बड़े ही निश्चल तरीके से लिखा है, उनका उदगार इतना सरल और &lt;span class=""&gt;NOSTALGIC &lt;/span&gt;है की मन विह्वल हो गया ....अन्दर ही अन्दर  मन कुछ द्रवित सो हो गया जैसे संजीव ने कोए के अन्दर की तरलता का जिक्र किया है... वो बचपन की यादें , वो कागज़ की कश्ती , वो बारिश का पानी )&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;फस्सिल में ताडी की बहार' पढ़कर मन रस से सराबोर हो गया। देर तक जेहन में आखिरी पंक्तियाँ टपकती रहीं - 'ताडी मगह का बियर है जो फस्सिल में सरेआम बहता है। आप उन्जरी लगायें और पियें पेट भरकर, यह तरावट भी देगा और शुरूर भी जो इस धरती पर कहीं और नहीं'. मन हुआ कि तत्काल उड़ कर मिटटी की खुश्बुओं-वाली अपने देसी महफिल में जा पहुंचूं, उन्जरी लगाऊं और छक कर पियूं - और तरावट और शुरूर के मौज में वहाँ के कहकहों में डूब जाऊं ...लेकिन इस कल्पना में एक पेच है - वह यह कि इस परम आनंद के लिए यह अनिवार्य होगा कि मैं गंगा पार उत्तर बिहार, जहां मेरा गाँव व घर है, वहां न जाकर मगह के किसी रसिक दोस्त के यहाँ जाऊं, क्योंकि मुजफ्फरपुर या उस तरफ के किसी कस्बे या गाँव में किसी ने भी - वह सम्बन्धी हो, कि शुभचिंतक, कि आलोचक - अगर जो रसरंजन  करते मुझे देख लेता है तो मेरी खैर नहीं - मां पछाड़ खा गिरेगी, पिता की नाक कट जायेगी, ससुर मुंह दिखने लायक नहीं रह जायेंगे, बीबी कच्चा चबा जायेगी - खुलासा की मेरी दुनिया तबाह हो जायेगी. दक्षिण और उत्तर बिहार में ताडी पर इतना भेद मेरी समझ में नहीं आता है. कौशल जब कभी ताडी के महफिल की रस-भरी कहानियाँ सुनाते तब मेरे अन्दर का सर्वविदित आवारा पक्ष अपराधबोध में फंस जाता. अब मैं कौशल को कैसे बताता कि उनके इस रसिक परम मित्र को ताडी का कोई इल्म नहीं. मुझे खुद भी ताज्जुब होता है कि कमबख्त क्या कुछ नहीं किया, फिर ताडी क्यों नहीं पिया? मुझे लगता है कि यह दोष मेरा नहीं, उत्तर बिहार का है.बहरहाल ताडी या या ताड़ के पेड़ से जुडी मेरी जो यादें और अनुभव है वह सब तब की हैं जब मेरी उम्र दस-एक वर्ष से ज्यादा नहीं रही होगी - तब मुजफ्फरपुर के जिस मोहल्ले में मेरा घर है वहां गिने-चुने घर थे, बाकी ज़मीन खाली थी जिसमे ढेर सारे ताड़ और खजूर के पेड़ थे. हर रोज सुबह और शाम को, दोपहर का मुझे याद नहीं, इकहरी काठी का लचकीला, सख्त काला आदमी, खाली बदन दिनचर्या की पिनक में निर्वेग भाव से ताड़ के पेड़ के पास आता, पैडों में फांस लगाता और देखते-देखते ताड़ के पेड़ के बिलकुल ऊपर पत्तों के बीच पहुँच कर खडा हो जाता, अपने कमर से फंसली निकालता और क्या कुछ करता यह मुझे तब पता नहीं चलता, फिर ताडी उतारता, कमर में लबनी को फिट करता और उसी कलाबाजी से नीचे उतर आता. मैं सम्मोहित उसे तब तक देखता रहता जब तक वह वहाँ से चला नहीं जाता. मेरे अलावा कुछ और बच्चे भी इकठ्ठा हो जाते थे क्योंकि अक्सर वह पेडों से लगे फलों को काट कर नीचे गिराता जिनके लिए बच्चों में लूट मच जाती. उन फलों को नारियल कि तरह काट कर भीतर से बेहद मुलायम हल्की मीठास-वाली चीज़ निकालते जिसे वहाँ के लोग-बाग़ 'कोआ' कहते हैं. मैं उस भगदड़ को असहाय देखता रह जाता, मेरे हाथ कभी भी कुछ भी न लगता. एक दिन बिलकुल सुबह के वक़्त, सूरज अभी तरीके से निकला भी नहीं था, कि वह पेड़ पर चढ़ता दिखा. मैं चुपचाप वहां आ पहुंचा - और संयोग कि धबाधब फल गिरने लगे. जब तक वह नीचे उतरता तब तक मैं दूसरी खेप घर पहुंचा आया था. उतर कर उसने मुझे एक नजर फलों को इकठ्ठा करते देखा और उसी निर्वेग भाव से अपने रास्ते चलता बना.तीसरी खेप ले जकर जब मैं घर पहुंचा तो क्या देखता हूँ कि मेरा बड़ा भाई और मेरी छोटी बहन आश्चर्य और उल्लास में फलों को घेर कर खड़े हैं. थोडी हीं दूर पर पिताजी चेहरे पर रंच-भर विस्मय भाव लिए कुछ इस तरह खड़े थे जैसे मेरी प्रतीक्षा कर रहें हों. उन्होंने छूटते हीं पूछा - यह तुम क्या सब ले आया है? मैंने बगैर नज़र मिलाये कहा कि 'कोआ' है, और फिर पता नहीं कहाँ से हिम्मत और बुद्धि आ गयी कि कह बैठा - सुबह में खाने से बड़ा फायदा करता है. पिताजी हंसने लगे, फिर पूछा - किसने बताया कि बड़ा फायदा करता है? और इसको काटेगा कौन? यह विकट समस्या थी. इतने में माँ आ गयी. पिता ने कहा - देखो, क्या ले आया है! चूँकि मैं इस इस बीच माँ से अक्सर 'कोआ' का ज़िक्र करता था और बाज़ार में कई बार उससे 'कोआ' खरीदने की जिद कर चुका था, वह क्षण-भर में मेरे विकल इच्छा को समझ गयी. उसने पिताजी को हल्के में झिड़कते हुए कहा - अच्छा ठीक है, ज़हर नहीं ले आया है न , बहुत दिन से इसका मन भी था. फिर मेरी तरफ देख कर कहा - कोई बात नहीं. पिता ने फिर टांग अड़ाया - इसको काटेगा कौन? माँ ने तपाक से कहा - इसमें क्या है, थोडी देर में सिवचनरा इधर आएगा हीं, वह काट देगा.समस्या का समाधान तो हो गया लेकिन तसल्ली न हुई, इसलिए कि अभी छः-साढे छः का हीं वक़्त था और सिवचनरा नौ बजे तक आता था. दूसरा डर यह भी हो रहा था कि ऐसा न हो कि वह आये हीं नहीं, क्योंकि वह कभी-कभी नहीं भी आता था - सिवचनरा हमारे मुहल्ले का फ्रीलांस, औलराउंडर श्रमिक था जिसके योग्यता-विस्तार और खुश मिजाजी का जोड़ा नहीं था. बागवानी में शाक-सब्जी लगवाना हो कि पुचारा करवाना हो, कि बाज़ार से अच्छे क्वालिटी का ताज़ा मछली-गोश्त मंगवाना हो, या शादी-व्याह में न्योता भिजवाना हो, कि बदन का तोड़-कर मालिश करवाना हो - सिवचनरा का जवाब नहीं था. वह गीत गाता, लोगों से लुत्फ़ लेता, अपना काम बिलकुल तसल्लीबख्श पूरा करता जिसके एवज़ में लोग उसे मेहनताना के इलावा भोजन व चाय भी देते.बहरहाल सात बजा, साढ़े-सात हुआ, शिलांग रेडियो पर पुराने फ़िल्मी गानों का बेमज़ा प्रोग्राम शुरू हो कर आठ बजे ख़त्म हुआ, लेकिन सिवचनरा न आया. उसके आने में अब भी घंटा भर का वक़्त था. तभी मुझे ख्याल आया कि वह काटेगा किस चीज़ से. मैंने मां से पूछा - मां ने कहा कि जाओ बगल-वाले के यहाँ से 'दाब' मांग कर ले आओ. 'दाब' लेने मेरी छोटी बहन भी मेरे साथ चल पड़ी. वहाँ पूछा गया की 'दाब' का क्या काम है. मेरी बहन ने किस्सा खोल कर रख दिया, और वहाँ के तीन और बच्चे हमारे साथ हो लिए - अब युद्ध क्षेत्र में बस नायक की कमी थी, वह कब आयेगा यही प्रमुख चिंता थी. वक़्त काटे न कट रहा था ... कि सिवचनरा दिखा, हम सब समवेत पुकार उठ्ठे. वह सीधा हमारे पास आया. मां भी बाहर आ गयी. आग्रह किया गया. उसने कहा - अभी त एकदम खिच्चा है. फिर छक्क- छक्क बीचो-बीच वह काटता गया - दोनों हिस्सों के बीच में सिहरता सम्पूर्ण पारदर्शक तरल - निकालने के बाद मटमैले गुलाबी आकृति में गिरफ्तार - मेरे आनंद का पारावार नहीं था - कामना पूरी हुई और मन भरा. ...क्रमशःसंजीव रंजन , मुजफ्फरपुर&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6996085666643607964-8146919060469576385?l=daudnagar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daudnagar.blogspot.com/feeds/8146919060469576385/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/05/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/8146919060469576385'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/8146919060469576385'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='फस्सिल में ताड़ी की बहार : कुछ बात अपनी भी'/><author><name>SUJIT CHOWDHURY</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13467435738041572234</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SbJ8HC2BcgI/AAAAAAAAAB8/gar-VF_uQEU/S220/IMG_0134.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6996085666643607964.post-1456991469564664267</id><published>2009-04-26T09:18:00.000-07:00</published><updated>2009-04-26T09:31:22.376-07:00</updated><title type='text'>फस्सिल में ताड़ी की बहार</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ffcc66;"&gt;( मित्र कौशल ने मगह क्षेत्र में ताड़ी पीने की सामाजिक परंपरा पर अपना आलेख लिखकर मगह के सामाजिक - सांस्कृतिक जीवन में ताड़ी, पासी जाति, पासीखाना और ताड़ी की सामाजिक मान्यता पर आपसी विचारों के आदान - प्रदान के लिए एक नया मंच खोला है. मैं जानता हूँ की कौशल जी ने ताड़ी चखने से ज्यादा कुछ नहीं किया है परन्तु उन्होंने ताड़ी को गैर-मगही नजरिये से ( जो ताड़ी को निकृष्ट मानता है ) बाहर निकाल कर मगह की लोक संस्कृति में ताड़ी के महत्व को स्थापित किया है . चलिए उनसे उत्प्रेरित होकर मैं ताड़ी पर यह आलेख लिख रहा हूँ )&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;परदेस प्रवास में कभी-कभी मादरे-वतन की यादें आती रहती हैं. त्यौहार हो, बदलते मौसमों की खुमार हो या रिश्तों के हाल-चाल .... अपनी जमीन की खुसबू और उसकी खींच से हम मुक्त नहीं हो पाते. अब तो दूरसंचार का जमाना है . हरेक साल गर्मियों में हमारे मित्र गण दाऊदनगर से फ़ोन करते हैं की " ...फस्सिल (फसल का मगही अपभ्रंश ) ) आ गईल हऊ अऊर बगईचा में ताड़ी पिय थी और तोरा याद आवा हऊ " . इस साल भी फ़ोन आया और फस्सिल की यादें तरोताजा कर गयीं. फस्सिल यानि गर्मियों के महीने जो बैसाख से शुरू हो जाती है और आसाढ़ के प्रारंभ तक चलती है. इन महीनों में ताड़ी का रिसाव तापमान के साथ -साथ बढ़ता जाता है. आसाढ़ के मेघ और बारिश की फुहारों से ताड़ी पनिया जाता है और इसकी मिठास बढ़ जाती है. अब तो ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव भी फस्सिल पर पड़ रहा है सुनते है गर्मी के बढ़ जाने के कारण फागुन- चैत से ही फस्सिल शुरू हो जाती है.&lt;br /&gt;मगध में ताड़ी के पेड़ काफी संख्या में पाए जाते हैं. पूरे औरंगाबाद जिले में हसपुरा के बाद दाऊदनगर का क्षेत्र ताड़ बहुल है. इसीलिये यहाँ की जनसँख्या में पासी जाति के लोग काफी हैं. उनका आर्थिक श्रोत ताड़ी और सिंघाडा (एक पानी में उगनेवाला फल ) होता है. फस्सिल के महीनों में उनका घर या ताड़ के बगीचों में उनकी अस्थायी झोपडी पासीखाना या ताडीखाना में तब्दील हो जाता है. लोग दस बजे सुबह तक वहां पहुँच जाते हैं. tabtak सुबह की ताड़ी आ चुकी होती है और उसके रसपान से शुरुआत होती है ताड़ी पीने की. दुपहर तक दूसरा खेप आ जाता है जो काफी नशीला और ज्यादा खट्टा होता है . चखने में सत्तू , चना , घूग्नी, मूंगफली चलती है. जो लोग रेगुलर ग्राहक होते हैं उनके लिए भोजन का भी प्रबंध हो जाता है. शाम ढलते - ढलते एक और खेप आता है. ताड़ी पीने का यह दौर रात तक चलता है. अर्ध-रात्री की ताड़ी सबसे जायकेदार होती है . दूसरी बात, ताड़ एक diocious plant है यानी नर और मादा पेड़ अलग अलग होते हैं. इसीलिये ताड़ दो तरह के होते हैं : बलताङ (नर) और फलताड़ (मादा) . फल्ताड़ की ताड़ी उतनी स्वादिष्ट नहीं होती. सर्दियों के दिनों की ताड़ी या अहले सुबह की ताड़ी अगर पी जाये तो स्वास्थ के लिए बहुत अच्छा होता है क्योंकि ताड़ी में sucrose होती है और fermentation के कारण वह नशीला हो जाता है. मुझे याद है मेरे नाना जो डॉक्टर थे , यकृत के मरीजों को बाकायदा सुबह की ताड़ी पीने की सलाह दिया करते थे.&lt;br /&gt;हाँ मित्रों , फस्सिल में बगीचे पिकनिक स्पॉट में बदल जाते हैं. लोगों का हुजूम. क्या अमीर क्या गरीब. क्या उच्च वर्ण और क्या नीची जाति ले लोग. यह मयकदा सबों को मस्ती के एक धरातल पर ले आता है. गप-शप, विचार-विमर्श, देस-दुनिया की खबरें, गीत-संगीत. हाँ ताड़ी पीने या रखने का पैमाना भी होता है : चुक्का , पंसेरा, लबनी और सबसे बड़ा घडा. अगर जमात बड़ी हो और पीने का दौर लम्बा हो तो एक-दो लबनी काफी होती है. ताड़ी पीने के लिए पासी ताड़ के पत्तों से दोनी बनाकर देता है जिसमे ताड़ी पीने का अलग ही अंदाज होता है.&lt;br /&gt;मैंने सबसे पहले ताड़ी अपने पडोसी " गुप्तवा " जो जाति का भङभूँज़ा था , उसके घर में पिया . फस्सिल में घर में ताड़ी लाना और पीना आम बात थी और उस तबके के लोगों में स्त्रियाँ भी ताड़ी पीती हैं. जो लोग वृद्ध थे और उनका घर के बाहर आना - जाना मुश्किल था या वे लोग जो बगीचे या पासीखाने में जाना अपनी शान के खिलाफ मानते उनके लिए पासी घर में ताड़ी दे जाता मगर ताड़ी पीने की परंपरा सर्वव्यापी थी.&lt;br /&gt;जब मैं बड़ा हुआ और अपनी दोस्तों की मंडळी बनी तो एक मित्र जो ताड़ के बगीचे के मालिक थे और डोमन चौधरी को ठीका देते थे उसीके घर में जो बगीचे के नजदीक थी वहीं हम रोज़ ताड़ी पीते थे . खाना खाने दुपहर में घर आते , खाना खाकर थोडा सोते और शाम से देर रात तक ताड़ी का दौर चलता. हम गाना गेट, कवितायेँ सुनते- सुनाते, नाटक खेलने की योजना बनाते, गंभीर चर्चाएँ (जिसमे कार्ल मार्क्स के विचारों पर भी बातें होतीं ) करते थे.&lt;br /&gt;डोमन चौधरी का ताडीखाना को हम &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;लबदना युनीवर्सिटी कहते थे जिसके वाइस चाँसलर खुद दोमन चौधरी हुआ करते थे और हम उनके छात्र थे. डोमन चौधरी हमारे लिए सबसे अच्छे ताड़ की ताड़ी और विशिस्ट चखने का इंतजाम करते. हरेक बगीचे और अलग अलग पेडों की ताड़ी की अलग अलग तासीर और स्वाद हुआ करता था और आमतर लोग किसी खास बगीचे या किसी खास पेड़ की ताड़ी ही पीना पसंद करते थे.&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ताड़ मगह का बियर है जो फस्सिल में सरेआम बहता है आप उन्जरी लगायें और पियें पेट भरकर , यह तरावट भी देगा और शुरूर भी जो इस धरती पर कहीं और नहीं !&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6996085666643607964-1456991469564664267?l=daudnagar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daudnagar.blogspot.com/feeds/1456991469564664267/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/04/blog-post_26.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/1456991469564664267'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/1456991469564664267'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/04/blog-post_26.html' title='फस्सिल में ताड़ी की बहार'/><author><name>SUJIT CHOWDHURY</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13467435738041572234</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SbJ8HC2BcgI/AAAAAAAAAB8/gar-VF_uQEU/S220/IMG_0134.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6996085666643607964.post-2641886734311984068</id><published>2009-04-26T09:04:00.001-07:00</published><updated>2009-04-26T09:09:45.807-07:00</updated><title type='text'>ताडी पियो तरन भयो , सुखी भयो संसार</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#33cc00;"&gt;(यह आलेख मित्र कौशल किशोर ने अपने ब्लॉग patnagandhimaidan पर पोस्ट किया । चूँकी विषय ताडी है और इसका मगध क्षेत्र से गहरा ताल्लुक है इसीलिये इसे यहाँ भी पोस्ट कर रहा हूँ )&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;यूँ तो पटना बिहार राज्य की राजधानी है पर यह अपने मूल चरित्र में - खास कर शहर का पुराना हिस्सा - मगही शहर है.तो जाहिर है की शहर मगही लोक संस्कार और रंग -ढंग में ओत -प्रोत होगा .&lt;br /&gt;मगही लोक जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है , चैत , बैसाख और जेठ के महीनों में बाग , बगीचों , खलिहान और ताड़ के पेडों के इर्द - गिर्द पियाकों का मजमा . ताडी के इस मजमें को आप इस मौसम में मगह के गाँव , कस्बों से लेकर पटना शहर के भीतरी न सही पर बाहरी इलाकों तक में देख सकते है.एक बात और , मगह क्षेत्र में ताडी और इसके चाहने वालों को उस नीची निगाह से नहीं देखा जाता है जैसा की गंगा पार में नजरिया है.&lt;br /&gt;करीब करीब पूरा मगध क्षेत्र ताड़ के पेडों से भरा हुआ है. ग्रामीण इलाकों में बैसाख के मध्य तक ग्रामीण जन खेती बारी के काम से निवृत हो जाते हैं . लगन , माने के शादी व्याह की शुरुयात हो जाती है. लोग बाग़ अपने बचे खुचे सामजिक काम करते है. यह मौसम लोगों की जुबान में कहें तो बैठा - बैठी का समय है. खेती के काम से फुरसत .मानसून के आने तक खेती का अमूमन कोई काम नहीं.ताड़ के पेड़ घौद से लड़ने लगते हैं.बलुरियाह और घौदहा दोनों तरह के ताड़ के पेडों पर लबनी टंग जाती है और पासी सबेरे शाम ताड़ से ताडी उतारने का क्रम शुरू कर देता है.मौसम जैसे जैसे तपता है ताडी की मात्रा और मादकता बढती जाती है.अगर आप पटना से गया बरास्ता मसौढी , जहानाबाद या फिर फतुहा हिलसा इस्लामपुर , नवादा बिहारशरीफ किधर को भी निकल जाएँ , ताडी के मतवालों की भीड़ ताड़ पेड़ के इर्द गिर्द बाग़ बगीचों में बैठी मिल जायेगी.उस समूह में आप बिअत्हें तो दीं दुनिया जहान की बातें ये ताडी प्रेमी करते मिलेंगें. बात चीत के दायरे में सब कुछ. इस साल तो चुनाव का मौसम है . शासन सुशासन से लेकर नीतीश , लालू , पासवान , सोनिया , अडवाणीजी सब की चर्चा होती होगी. घर - परिवार ,शादी - विवाह ,आस - पड़ोस , दोस्ती - दुश्मनी , और हाट - बाजार सब पर विचार मंथन होता है.&lt;br /&gt;किस्सागोई अगर सीखना हो तो आप इस तरह की किसी मंडली में बैठें .बहुजन - हिताय और बहुजन -सुखाय विमर्श को ,ताडी के मादक रस में , होते अनुभव करना चाहते हों तो मगह क्षेत्र में बैसाख के इस लोक उत्सव में शामिल हों .&lt;br /&gt;शर्त के साथ मैं यह कह सकता हूँ की लोक मंगल की भवन में आपका जरा भी विश्वास है तो एक बार के बाद आप पुनः पुनः इस लोक रंग में भींगना चाहेंगें ।&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;आलेख: कौशल किशोर&lt;br /&gt; &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6996085666643607964-2641886734311984068?l=daudnagar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daudnagar.blogspot.com/feeds/2641886734311984068/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/04/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/2641886734311984068'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/2641886734311984068'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='ताडी पियो तरन भयो , सुखी भयो संसार'/><author><name>SUJIT CHOWDHURY</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13467435738041572234</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SbJ8HC2BcgI/AAAAAAAAAB8/gar-VF_uQEU/S220/IMG_0134.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6996085666643607964.post-6296854388295194341</id><published>2009-03-06T22:27:00.000-08:00</published><updated>2009-03-11T03:04:51.991-07:00</updated><title type='text'>होली की यादें</title><content type='html'>हरेक साल फागुन में एक खास खुशबू भरा हवा का झोंका मुझे यह एहसास दिला जाता है की होली आने वाली है । इस हवा के झोंके में एक खास खुशबू होती है , आम के परिपक्व मंजर, नीम के फूल और न जाने किन किन फूल पत्तों की। मैंने इस खुशबू के झोंके को दिल्ली, चेन्नई , मुंबई और बंगलोर में महसूस किया है। यह झोंका अपने साथ बचपन की होली की यादें ले आती है। मुनीर नियाजी के ग़ज़ल का एक शेर याद आ जाता है जिसका वातावरण तो अलग है लेकिन भावना समान है, " लाई है फिर उड़ाके गए मौसमों की बास , बरखा की रुत का कहर है और हम हैं दोस्तों , उस बेवफा का शहर है और हम हैं दोस्तों।"&lt;br /&gt;यह फागुनी बयार और इसकी बास मेरे मन को गुदगुदा जाते हैं , जेहन को सहला जाते हैं और ऐसा लगता है जैसे किसी ने अपने नर्म हथेलियों से मेरे गालों पर गुलाल मल दिया हो। साथ ही याद आ जाती हैं दाऊद नगर की होली की स्मृतियाँ । वसंत पंचमी के बाद मुहल्ले में शाम या रात को कुछ लोग होली गाना शुरू कर देते थे। ढोलक और झाल बजता था । इसमे कृष्ण और राधा और बृज का उल्लेख होता था। फागुन कृष्ण पक्ष के दूज के दिन अगजा (होलिका दहन का स्थान ) को विधिवत स्थापित किया जाता था । उस स्थान पर रेड़ के पौधे (अंगरेजी में केस्टर ) को लगाया जाता था। उसके बाद हम बच्चे घर-घर घूम कर लकड़ी माँगा करते थे । " ऐ जजमानी तोरा सोने की किवादी , दू थो गोंठा दा दा, दू थो लकड़ी दा।" मज़े की बात है की हम लकड़ी चुराया भी करते थे और यह मान्य था। रात को मेरे घर का नौकर पहरा देता था की कोई हमारे घर का गेट न चुरा ले जाए। मैंने सुना था की एक बार होली में हमारा गेट अगजा की आहुति बन गया था ।। मुझे याद है की दिन दहाड़े हम लोग एक पुरानी हवेली जिसका मालिक नहीं था और हवेली खंडहर में तब्दील हो चुकी थी , उससे बड़ी बड़ी शहतीरें चुरा लाये थे । हमने बड़े मुश्किल से अपने नन्हे कन्धों पर उन शहतीरों को झेला था । जैसे जैसे होली नजदीक आती , होरी के गीतों का लहजा और विषय बदल जाता । " बिरज में होली खेलें कान्हा " से " गोरी ऐसी पातर , जैसे लचके लवंगिया के दार ।" फागुन पूर्णिमा के शाम या रात (मुहूर्त के मुताबिक ) अगजा जलाई जाती थी । इसमे मांगी और चुराई छुपाई गयी लकडियों के साथ खरीब की फसल जैसे मटर, गेहूं , चना भी जलाये जाते और उसे प्रसाद की भावना से खाया जाता था। chana या बूट के पौधे को बूट झंग्री बोलते थे और उसे जलाकर खाते थे। कुछ लोग , जिनके परिवार में किसी को मिर्गी जैसी मर्ज़ या भूत प्रेत की छाया की आशंका रहती वे आंते की लिट्टी / रोटी बनाकर लाते और अगजा में उसे जलाकर रोगी को खिलाते । इतनी पावन है अगजा की आग !&lt;br /&gt;अगजा में जली वस्तुओं की राख से शुरुआत होती धूर-खेर । लोग उस राख को एक दूसरे को लगाते और सुबह तक यह खेल मिटटी कीचड में विकशित हो जाती। कीचड से होली की शुरुआत होती फिर हम नहाते और फिर रंग भरी होली शुरू होती। तरह तरह के रंग ! एक दानेदार रंग आता था जिसे हथेलियों में थोड़ा सा पानी मिलाकर गालों पर लगाया जाता था जिसे छुटने में कई दिन लग जाते । हम उसे एस्ट्रा कहते थे। बाज़ार में जब एनामेल आया तो लोगों ने सिल्वर / गोल्डन रंग का इस्तमाल शुरू किया । इसे छुटने के लिए स्पिरिट या केरासिन तेल की जरूरत होती। जब सूरज पूरा जवान हो जाता और दोपहर ढलने को होती तो हम घर लौटते । हर साल की तरह बुरे रंगों से होली खेलने के लिए फटकार पड़ती । शाम को हम कुरता पजामा पहन गुलाल से होली खेलते । लोग एक दूसरे के घर जाते , मिलते , खाते पीते। हाँ , भंग भोग सुबह से ही शुरू हो जाता था । जब शहर में इकलौती ' अंग्रेज़ी शराब की दूकान " खुली, तो विदेशी का भी प्रयोग शुरू हुआ। खाने में मांस , कटहल और ओल की सब्जी , दही वादा और घुग्नी परोसे जाते । कुछ खट्टा भी जिससे नशा उतरे।&lt;br /&gt;दूसरे दिन दाऊद नगर में होता ' झूमता ' ।&lt;br /&gt;झूमते के दिन हरेक मुहल्ले में तैयारी होती झुंड बनाने , रंगों के लिए बड़े पात्र जैसे ड्रम , पीतल की बड़ी बड़ी पिचकारियाँ और बैल गाड़ी । एक मुहल्ले का झूमता सारे मुहल्लों से गुजरता जैसे विभिन्न मुहल्लों के बीच प्रतियोगिता हो रही हो ।। कौन किस पर कितना रंग डाले ! अगर सड़क या गलियों में आमना सामना होता तो जैसे रंगों से मार ! मुहल्लों से गुजरते हुए हम उन मुहल्लों में रहने वालों खास कर छतों - मुंडेरों पर इकट्टी नारियों से होली खेलते । वे ऊपर से हम पर पानी डालतीं और हम नीचें से पिचकारियों की धार से वार करते । हम सारा दिन भींगते हुए होली खेलते और हमारा सफर बाज़ार पहुंचकर ख़त्म होता जहाँ सभी झूमता इकट्ठा होते। भंग का नशा अपनी पराकास्था पर होता । लोग एक दूसरे का कपड़ा फाड़ते , गले मिलते और होली गाते , " अंखियाँ भईल लाले -लाल , एक नींद सुते दे पतोहिया " या " जोगीरा सररर आ रा रा रा रा " जिसमे मजाक और अश्लील बातें होतीं ।&lt;br /&gt;होली और झूमता के बाद कई दिनों तक नशे का शुरूर रहता और बदन -चेहरे पर रंगों की लज्ज़त । हम फिर इंतज़ार करते अगले साल की होली की ।। अब तो वह होली ही नहीं , उसकी यादों से होली मनाते हैं । गालिब का शेर याद आता है , " ....अब वो रानाईये ज़माल कहाँ , वो शबों - रोजों माहो साल कहाँ .....फिक्र्रे दुनिया में सर खपाता हूँ , मैं कहाँ और ये बवाल कहाँ ।"&lt;br /&gt;( होली की इन स्मृतियों को पुनर्जीवित करने में दाऊद नगर के मित्र प्रिय गणेश जी ने मदद की। मित्र संजीव ने भूले बिसरे शेरो को याद दिलाया । उन्हें धन्यवाद ! सबों को होली की शुभ कामनाएं ! )&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6996085666643607964-6296854388295194341?l=daudnagar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daudnagar.blogspot.com/feeds/6296854388295194341/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/03/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/6296854388295194341'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/6296854388295194341'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='होली की यादें'/><author><name>SUJIT CHOWDHURY</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13467435738041572234</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SbJ8HC2BcgI/AAAAAAAAAB8/gar-VF_uQEU/S220/IMG_0134.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6996085666643607964.post-2214297407491447610</id><published>2009-02-16T22:53:00.000-08:00</published><updated>2009-02-16T22:57:29.285-08:00</updated><title type='text'>daudnagar का किला: archaeological survey of India द्वारा दिए गए तथ्य     </title><content type='html'>Daud Khan Fort, Daudnagar, Aurangabad&lt;br /&gt;This fort is situated on the eastern bank of the Sone River and was founded by Dhaud Khan, a Governor of Bihar under Aurangzeb in the 17th of Palamu fort from the Cheros; and it is said that while back from this conquest he camped here and founded the town known after him. The surrounding area was also granted to him as a Jagir by the emperor. Early in the 18th century Buchanan saw it as a flourishing town with cloth and opium factories. The sarai built by Daud Khan was, perhaps really meant to be a stronghold; for it was well fortified with a battlemented wall, two large gates and a moat all around. It was called as a sarai probably to avoid jealousy of the Government. The sarai was in good condition till a few years before 1896; for the Bengal list says that the gates were regularly shut every night. Ahmad Khan, grandson of Dhaud Khan, fortified the town which was then named as Ghausipur. The town also contains an old mosque and another sarai built by Ahmad Khan, which had mud gates. In the outlying part of the town called Ahmadganj is the tomb of Ahmad Khan.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6996085666643607964-2214297407491447610?l=daudnagar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daudnagar.blogspot.com/feeds/2214297407491447610/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/02/daudnagar-archaeological-survey-of.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/2214297407491447610'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/2214297407491447610'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/02/daudnagar-archaeological-survey-of.html' title='daudnagar का किला: archaeological survey of India द्वारा दिए गए तथ्य     '/><author><name>SUJIT CHOWDHURY</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13467435738041572234</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SbJ8HC2BcgI/AAAAAAAAAB8/gar-VF_uQEU/S220/IMG_0134.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6996085666643607964.post-1445282704668832326</id><published>2009-02-10T00:08:00.000-08:00</published><updated>2009-02-10T02:14:08.880-08:00</updated><title type='text'>जितिया : एक अनोखा त्यौहार</title><content type='html'>जितिया &lt;span class=""&gt;daudnagar &lt;/span&gt;में काफी धूम धाम से मनाया जाता है जिसमे सभी लोग धर्म, संप्रदाय, जाति और आर्थिक वर्ग से ऊपर उठकर सम्मिलित होते हैं।   जितिया वास्तव में जिमुतवाहन का पर्व है जो उत्तर और पूर्व भारत में मनाया जाता है।  इस पर्व पर माताएं पुत्र जीवन के लिए पूजा करती हैं और पुत्रहीन माताएं भी पुत्र प्राप्ति के लिए पूजा करती हैं। यह त्यौहार दशहरा से पहले मनाया जाता है। यह पूजा अनंत चतुर्दशी से शुरू होती है और दस दिनों तक चलती है। पहले दिन, daudnagar में चार या पॉँच जगहों पर ओखली (धान कूटने के लिए बनी लकड़ी की चीज) रखी जाती है और उसके पूजन से जितिया की शुरुआत होती है।  सातवे दिन माताएं एक खास तरह के साग या दूब को पानी से निगलकर  अपना उपवास तोड़ती हैं। ऐसा भी सुना है कि जिन माताओं के पुत्र बालावस्था में ही मर जाते हैं वे जीवित छोटी मछली निगल कर उपवास तोड़ती हैं। &lt;br /&gt;daudnagar के जितिया का अनोखा पक्ष है की यहाँ के बच्चे और युवा ' नक्कल' बनते हैं। नक्कल मतलब भेष बदलना और पूरे शहर में नक्कल बनकर घूमना। नक्कल बनना उनके लिए अनिवार्य होता है जिनका जन्म जिमुतवाहन के आशीर्वाद से हुआ हो। मगर जितिया में (मैं अपने बचपन यानि कम से  कम तीस साल पहले कि बात बोल रहा हूँ) शहर के काफी लोग नक्कल बनते थे और जहाँ देखिये नक्कल ही नक्कल। आपने गोवा के &lt;span class=""&gt;carnival &lt;/span&gt;के बारे में सुना होगा , कुछ वैसा ही।   नक्कल कि उत्पति में कोई जनजातीय परम्परा नहीं है क्योंकि daudnagar में कोई जन जाति नही है। &lt;br /&gt;जितिया के समय सामाजिक बंधन ढीले हो जाते हैं और सामाजिक सांस्कृतिक तबू नहीं रहती। कोई किसीसे से भी मजाक कर सकता है या किसीका भी मजाक / मखौल उदा सकता है। सब मान्य है। नक्कल के विषय पारंपरिक और सामयिक मुद्दों से लिए जाते हैं यहाँ तक कि स्थानीय मुद्दे भी। पुरूष स्त्री रूप धारण करते हैं। जैसे मछली बेचने वाली या बाई स्कोप दिखने वाली। कोई नट बनता है तो उसका साथी नट्टिन। कोई सुल्ताना डाकू बनता तो कोई लैला की खोज में भटकता मजनू । कोई जोगी बनता तो कोई भिखारी। सड़कों और बाजारों में घुमते ये नक्कल daudnagar के कुछ संभ्रांत लोगों के बैठक पर भी जाते जहाँ उन्हें बख्शीश मिलती। इन नक्कालों में दिल्ला काफी मशहूर था । वह एक गोरा चिट्टा नवजवान था और पेशे से मछलीमार था। वह स्त्री रूप धारण करता और लोग समझते कि वाकई वह एक औरत है। सुल्ताना डाकू एक बहुचर्चित पत्र था। एक नक्कल सुल्ताना डाकू बनता और एक एक उसका साथी प्रधान सिंह। मुझे याद है , मेरे नाना डॉक्टर थे और सभी नक्कल हमारे बैठक में जरूर आते थे। हाँ एक चीज , सभी नक्कल खासकर बड़ी उम्र के शौकिया और अनुभवी नक्कल शराब जरूर पीते थे। नाना देशी शराब में कुछ मिलवाते थे जिससे उसका रंग पारदर्शी से बदलकर लाल हो जाता था। यह शराब नक्कालों के लिए हमारे बैठक में आने का एक खास आकर्षण था जो घर के नौकर बैठक से लगे छोटे कमरे में नक्कालों को पिलाते थे। मजनू जंजीरों में बंधा और फटे कपड़े पहने आता और जमीन पर अपना सर पटकता और गता ," लैला लैला पुकारूँ मैं वन में, मेरी लैला बसी है मेरे मन में।"&lt;br /&gt;इसी तरह सुल्ताना डाकू आता और उसके आने का संकेत था कई बम विस्फोट ! फिर वह आता और अपने प्रधान से पूछता ," प्रधान जी, यह डॉक्टर कैसा आदमी है?" प्रधान कहता, " यह डॉक्टर गरीबों का खून चूसता है और इसीसे  काफी दौलत कमी है।" सुल्ताना अपनी बन्दूक कि नोक मेरे नाना जी कि तरफ़ उठता और कहता " डॉक्टर, अपने खजाने कि चाभी दे दे नहीं तो तेरी लाश बिच्छा दूँगा।" मैं बिल्कुल डरा नाना के पीछे खड़ा रहता और सोचता कि सचमुच यह नाना को मार देगा क्या? इसके बाद सुल्ताना और प्रधान मेरे नाना के पैर छु प्रणाम करते और पास वाले कमरे में रंगीन शराब पीने चले जाते।&lt;br /&gt;ऐसा होता था daudnagar का जितिया। अब दस दिनों का यह आयोजन तीन चार दिनों में सिमट गया है। हाँ स्त्रियाँ अन्तिम दिन ओखली कि पूजा बिना किसी समस्या से कर सकें इसके लिए मोहल्ले के नक्कल लाल परी और कला परी बनकर उनके साथ रहते है। अब तो सुना है कि टीवी वाले भी इसका प्रसारण करते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6996085666643607964-1445282704668832326?l=daudnagar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daudnagar.blogspot.com/feeds/1445282704668832326/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/02/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/1445282704668832326'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/1445282704668832326'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='जितिया : एक अनोखा त्यौहार'/><author><name>SUJIT CHOWDHURY</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13467435738041572234</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SbJ8HC2BcgI/AAAAAAAAAB8/gar-VF_uQEU/S220/IMG_0134.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6996085666643607964.post-5524650371057668243</id><published>2009-02-09T02:41:00.000-08:00</published><updated>2009-02-09T03:17:03.098-08:00</updated><title type='text'>daudnagar का sarai</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SZALR75yMVI/AAAAAAAAAA4/y9DqQwA48sY/s1600-h/daud+kila.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5300749164180812114" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 222px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SZALR75yMVI/AAAAAAAAAA4/y9DqQwA48sY/s320/daud+kila.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;daudnagar मुग़ल शाषण के दौरान एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक केन्द्र होने के साथ &lt;span class=""&gt;साथ, &lt;/span&gt;पटना और बनारस के बीच होने के कारण और ग्रैंड ट्रंक रोड के नजदीक होने के कारण परिवहन के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण था। चूँकि यह गया के करीब है और गया एक तीर्थ स्थान (पूर्वजों को पिंड देने का स्थान) था, इस रास्ते से काफी तीर्थ यात्री भी आया जाया करते थे। ठगी और लूट को हम नजरंदाज नहीं कर सकते। इसलिए daudnagar के इलाके में जान माल की सुरक्षा एक जरूरी शासकीय मुद्दा था। इसीलिए daudnagar में daudkhan ने एक बड़ा sarai बनवाया। &lt;/div&gt;२००६ में प्रकाशित किताब INDIA &lt;span class=""&gt;BEFORE &lt;/span&gt;EUROPE (Cambridge यूनिवर्सिटी प्रेस) में daudnagar के sarai का उल्लेख मिलता है। इस sarai को daudkhan ने 1659 se 1664 के बीच  बनवाया । Daud khan Kureshi  बिहार में मुग़ल governor था और इस इलाके में उसने एक स्थानीय जमींदार को हराया जो मुग़ल शाषण के खिलाफ था। अब तो इस sarai के दरवाजों के अवशेष बचें हैं । पहले यह sarai चारों तरफ़ से दीवारों से घिरा था और इसके दरवाजे रात को बंद रहते थे। मैंने पहले ब्लॉग पर लिखा है की daudnagar में एक मोहल्ले का नाम है पटना का फाटक जो पहले एक दरवाजा जो पटना की दिशा में खुलता था, हुआ होगा। sarai के अन्दर पूजा के लिए मन्दिर और मस्जिद भी थे। चारों तरफ़ छोटे छोटे कमरे थे जैसे आधुनिक होटल के कमरे। बीच के खुले बड़े जगह पर मवेशी और व्यापारिक चीजों को रखने की जगह थी।&lt;br /&gt;इस sarai को लोग daudkhan का किला मानते हैं। अगर यह किला है तो sarai कहाँ गया। daudnagar में अभी भी एक sarai रोड है मगर वहां ऐतिहासिक दृष्टि से ऐसा कुछ भी नहीं। वहां देशी शराब की भट्टी है और कुछ वैश्ययों के घर , तो यह एक बदनाम सड़क है। जो चित्र इतिहासकारों ने sarai का दिया है जिसे मैंने ऊपर  दिया है वह लोगों की नजरों में daudkhan का किला है। शायद और भी शोध की जरूरत है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6996085666643607964-5524650371057668243?l=daudnagar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daudnagar.blogspot.com/feeds/5524650371057668243/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/02/daudnagar-sarai.html#comment-form' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/5524650371057668243'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/5524650371057668243'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/02/daudnagar-sarai.html' title='daudnagar का sarai'/><author><name>SUJIT CHOWDHURY</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13467435738041572234</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SbJ8HC2BcgI/AAAAAAAAAB8/gar-VF_uQEU/S220/IMG_0134.JPG'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SZALR75yMVI/AAAAAAAAAA4/y9DqQwA48sY/s72-c/daud+kila.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6996085666643607964.post-1496748049547629023</id><published>2009-01-31T02:32:00.000-08:00</published><updated>2009-01-31T03:07:56.107-08:00</updated><title type='text'>daudnagar</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;daudnagar &lt;/span&gt;औरंगाबाद जिले का एक क़स्बा है।  इसका नाम daud खान से आया जो मुग़ल समय अथवा सूरी राज में सेना का अधिकारी था। कस्बे के पुराने इलाके में एक किला है । इस कसबे में एक मोहल्ला है जिसका नाम है पटना का फाटक । इसका मतलब है कि इसका इलाका सुरक्षा के वास्ते घिरा हुआ था । मैंने ब्रिटिश &lt;span class=""&gt;gazette &lt;/span&gt;में पढ़ा कि यह जगह दरी, पीतल के बर्तन और खेती के लिए  मशहूर था।  यहाँ मुनिसिपलिटी थी जो सौ सालों से भी पुरानी थी । कुछ सालों पहले जन गणना के मुताबिक इसका दर्जा मुनिसिपलिटी के लायक नहीं थी और यहाँ पंचायत समिति बन गई । ब्रिटिश शाषण के समय यहाँ नील (इंडिगो) और अफीम (ओपियम) के गोदाम थे ।  अभी भी यहाँ एक मोहल्ला है नील कोठी और अफीम कोठी ।।  यहाँ का बाजार विकसित था । सोन नदी और गंगा नदी के बीच नहर बनाया गया था ब्रिटिश समय में जो यहाँ से गुजरता है ।   नहर से खेती विकसित हुई और कई जगह बिजली निकालने के लिए मिल लगे। इस बिजली से मेकनिकल काम किए जाते थे जैसे तिलहन से तेल निकालना अथवा गेहूं कि पिसाई । यहाँ के जनसँख्या में कुछ जातियों का ज्यादा संख्या में होना उनके पारंपरिक बाहुल्य को दर्शाता है जैसे कसेरा (कांसा या पीतल के बर्तन बनाने वाली जाती या पटवा जो मिटटी काटकर नहर बनाने थे) । ब्रिटिश समय में यहाँ शराब का गोदाम भी था।   जब आजादी कि लड़ाई हुई तो लोगों नें गोदाम पर हमला किया । मेरी नानी बोलती थी कि कुछ लोगों ने १००% कांसन्त्रतेद शराब पी ली और मर गए। बाजार में विदेशी सामानों कि होली जलाई गयी । यह है कुछ शब्दों में daudnagar का परिचय ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6996085666643607964-1496748049547629023?l=daudnagar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daudnagar.blogspot.com/feeds/1496748049547629023/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/01/daudnagar.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/1496748049547629023'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/1496748049547629023'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/01/daudnagar.html' title='daudnagar'/><author><name>SUJIT CHOWDHURY</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13467435738041572234</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SbJ8HC2BcgI/AAAAAAAAAB8/gar-VF_uQEU/S220/IMG_0134.JPG'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6996085666643607964.post-9211318414496875547</id><published>2009-01-31T01:50:00.000-08:00</published><updated>2009-01-31T02:30:38.133-08:00</updated><title type='text'>घोड़ा साईं</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;daudnagar &lt;/span&gt;में एक मजार है जहाँ हिंदू और मुसलमान  समान श्रधा से  जाते हैं । यहाँ दो मजार हैं । एक नवाब साहेब का है और दूसरा  उनके घोड़े का । नवाब साहेब दुश्मनों का मुकाबला करते हुए घायल हो गए थे। उनका वफादार घोड़ा उनके शरीर को वापस शहर ले आया । घोड़ा भी घायल हो गया था। दोनों शहीद हो गए और दोनों का मजार दो जगहों पर  स्थापित हैं ।  घोड़ा साईं का मजार काफी मशहूर है और हरेक साल यहाँ उर्स होता है । लोगों का मानना है की वे सभी मुरादें पूरी करते हैं। कुछ साल पहले मै जब वहां गया था तो एक हिंदू ने मुझसे पूजा कराई। घोड़ा साईं का मजार धर्म से ऊपर धार्मिक सद्भावना का प्रतीक है और एक यह प्रतीक है वफादारी का वह भी एक जानवर का जो लोगों की नजरों में भगवन है ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6996085666643607964-9211318414496875547?l=daudnagar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daudnagar.blogspot.com/feeds/9211318414496875547/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/01/blog-post_31.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/9211318414496875547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/9211318414496875547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/01/blog-post_31.html' title='घोड़ा साईं'/><author><name>SUJIT CHOWDHURY</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13467435738041572234</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SbJ8HC2BcgI/AAAAAAAAAB8/gar-VF_uQEU/S220/IMG_0134.JPG'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-6996085666643607964.post-8366454015943530245</id><published>2009-01-31T00:12:00.000-08:00</published><updated>2009-01-31T01:06:30.485-08:00</updated><title type='text'>बड़े बाबु</title><content type='html'>यह सच्ची कहानी मैंने अपने दोस्तों को सुनाया करता था । बड़े बाबु एक बेरोजगार व्यक्ति थे । कायस्थ परिवार के थे इसलिए पढने लिखने का शौक था और जमीन थी तो शायद उन्होंने नौकरी की जरुरत नहीं समझी । चूँकि उनके पास समय ही समय था तो एक रूटीन में वो अपना समय बिताते थे। अखबार पद्गने का उनको शौक या नशा था । अखबार वो खरीदते नहीं थे । तक़रीबन दस बजे नाश्ता करके घर से निकलते और धीरे धीरे अपन वक्त काटते । कई जगह पड़ाव लगाकर आख़िर में नई शहर के बाजार में कामता के पान दुकान पर आते और देश दुनिया के ऊपर ( तब तक उन्ही की तरह कुछ रेगुलर लोग जो उसके दूकान पर उस समय बैठकी लगाते ) अपना विचार प्रकट कर वापस घर लौट जाते थे। उस समय बिहार में सिर्फ़ दो समाचार पत्र प्रकाशित होते थे , आर्यावर्त और प्रदीप । बड़े बाबु दोनों अख़बारों को काफ़ी डिटेल में पढ़ते थे शायद निविदा (टेंडर) पेज भी । मजे की बात तो यह थी की अपने कई पडाओं पर वो एक ही  अखबार बार बार पढ़ते थे। शायद समय काटने के लिए यह जरुरी था । pahla पड़ाव था पंडित जी का घर । पंडित जी के यहाँ एक अखबार आता था और वह उनके दालान में उपलब्ध रहता था। शायद घर का कोई व्यक्ति पढ़े न पढ़े अखबार दालान की शोभा थी । बड़े बाबु की तरह कई लोग जो उनके यहाँ आते अखबार पढ़ते थे । पंडित जी काफ़ी बूढे हो चुके थे और आंखों की रौशनी जा चुकी थी।  एक दिन की बात है बड़े बाबु रोज की तरह पंडित जी के यहाँ पहुँच गए और अखबार पढने लगे । पंडित जी झपकी ले रहे थे । थोडी कुछ देर बाद पंडित जी ने पूछा," का बड़ा बाबु , का समाचार है ? " बड़े बाबु ने कहा, " जी पंडित जी, अभी पढ़ी थी ।"  थोडी देर बाद पंडित जी ने फिर पूछा, "  का बड़ा बाबु कुछ समाचार तो बोला ।" बड़े बाबु ने फिर कहा, " जी पंडित जी अभी पढ़ी थी ।" थोड़ा समय और गुजरा और पंडित जी ने फिर पूछा " अरे बड़ा बाबु कुछ समाचार तो बतावा ।" बड़े बाबु ने फिर से कहा, " जी पंडित जी अबी पढ़ी थी कुछ होती तो बतैबी ।" पंडित जी के सब्र का काबू जैसे टूट गया । गुस्से से वे बड़े बाबु पर टूट पड़े ," एक घटा से पढ़ी था जे है से की सारा अखबार सादा है का ? "&lt;br /&gt;बड़े बाबु चुपके से निकल लिए और अपने अगले पड़ाव पर वही अख़बार फिर से पढ़ना शुरू किया जैसे कीच हुआ न हो और जैसे उन्होंने उस दिन का अखबार पढ़ा ही न हो । उनके दिनचर्या में कोई फर्क न आया , हाँ दूसरे दिन से वो पंडित जी के दालान में नहीं दिखे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/6996085666643607964-8366454015943530245?l=daudnagar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://daudnagar.blogspot.com/feeds/8366454015943530245/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/01/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/8366454015943530245'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/6996085666643607964/posts/default/8366454015943530245'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://daudnagar.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='बड़े बाबु'/><author><name>SUJIT CHOWDHURY</name><uri>http://www.blogger.com/profile/13467435738041572234</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://2.bp.blogspot.com/_buYgWVeTIL4/SbJ8HC2BcgI/AAAAAAAAAB8/gar-VF_uQEU/S220/IMG_0134.JPG'/></author><thr:total>2</thr:total></entry></feed>
