मंगलवार, 10 फ़रवरी 2009

जितिया : एक अनोखा त्यौहार

जितिया daudnagar में काफी धूम धाम से मनाया जाता है जिसमे सभी लोग धर्म, संप्रदाय, जाति और आर्थिक वर्ग से ऊपर उठकर सम्मिलित होते हैं। जितिया वास्तव में जिमुतवाहन का पर्व है जो उत्तर और पूर्व भारत में मनाया जाता है। इस पर्व पर माताएं पुत्र जीवन के लिए पूजा करती हैं और पुत्रहीन माताएं भी पुत्र प्राप्ति के लिए पूजा करती हैं। यह त्यौहार दशहरा से पहले मनाया जाता है। यह पूजा अनंत चतुर्दशी से शुरू होती है और दस दिनों तक चलती है। पहले दिन, daudnagar में चार या पॉँच जगहों पर ओखली (धान कूटने के लिए बनी लकड़ी की चीज) रखी जाती है और उसके पूजन से जितिया की शुरुआत होती है। सातवे दिन माताएं एक खास तरह के साग या दूब को पानी से निगलकर अपना उपवास तोड़ती हैं। ऐसा भी सुना है कि जिन माताओं के पुत्र बालावस्था में ही मर जाते हैं वे जीवित छोटी मछली निगल कर उपवास तोड़ती हैं।
daudnagar के जितिया का अनोखा पक्ष है की यहाँ के बच्चे और युवा ' नक्कल' बनते हैं। नक्कल मतलब भेष बदलना और पूरे शहर में नक्कल बनकर घूमना। नक्कल बनना उनके लिए अनिवार्य होता है जिनका जन्म जिमुतवाहन के आशीर्वाद से हुआ हो। मगर जितिया में (मैं अपने बचपन यानि कम से कम तीस साल पहले कि बात बोल रहा हूँ) शहर के काफी लोग नक्कल बनते थे और जहाँ देखिये नक्कल ही नक्कल। आपने गोवा के carnival के बारे में सुना होगा , कुछ वैसा ही। नक्कल कि उत्पति में कोई जनजातीय परम्परा नहीं है क्योंकि daudnagar में कोई जन जाति नही है।
जितिया के समय सामाजिक बंधन ढीले हो जाते हैं और सामाजिक सांस्कृतिक तबू नहीं रहती। कोई किसीसे से भी मजाक कर सकता है या किसीका भी मजाक / मखौल उदा सकता है। सब मान्य है। नक्कल के विषय पारंपरिक और सामयिक मुद्दों से लिए जाते हैं यहाँ तक कि स्थानीय मुद्दे भी। पुरूष स्त्री रूप धारण करते हैं। जैसे मछली बेचने वाली या बाई स्कोप दिखने वाली। कोई नट बनता है तो उसका साथी नट्टिन। कोई सुल्ताना डाकू बनता तो कोई लैला की खोज में भटकता मजनू । कोई जोगी बनता तो कोई भिखारी। सड़कों और बाजारों में घुमते ये नक्कल daudnagar के कुछ संभ्रांत लोगों के बैठक पर भी जाते जहाँ उन्हें बख्शीश मिलती। इन नक्कालों में दिल्ला काफी मशहूर था । वह एक गोरा चिट्टा नवजवान था और पेशे से मछलीमार था। वह स्त्री रूप धारण करता और लोग समझते कि वाकई वह एक औरत है। सुल्ताना डाकू एक बहुचर्चित पत्र था। एक नक्कल सुल्ताना डाकू बनता और एक एक उसका साथी प्रधान सिंह। मुझे याद है , मेरे नाना डॉक्टर थे और सभी नक्कल हमारे बैठक में जरूर आते थे। हाँ एक चीज , सभी नक्कल खासकर बड़ी उम्र के शौकिया और अनुभवी नक्कल शराब जरूर पीते थे। नाना देशी शराब में कुछ मिलवाते थे जिससे उसका रंग पारदर्शी से बदलकर लाल हो जाता था। यह शराब नक्कालों के लिए हमारे बैठक में आने का एक खास आकर्षण था जो घर के नौकर बैठक से लगे छोटे कमरे में नक्कालों को पिलाते थे। मजनू जंजीरों में बंधा और फटे कपड़े पहने आता और जमीन पर अपना सर पटकता और गता ," लैला लैला पुकारूँ मैं वन में, मेरी लैला बसी है मेरे मन में।"
इसी तरह सुल्ताना डाकू आता और उसके आने का संकेत था कई बम विस्फोट ! फिर वह आता और अपने प्रधान से पूछता ," प्रधान जी, यह डॉक्टर कैसा आदमी है?" प्रधान कहता, " यह डॉक्टर गरीबों का खून चूसता है और इसीसे काफी दौलत कमी है।" सुल्ताना अपनी बन्दूक कि नोक मेरे नाना जी कि तरफ़ उठता और कहता " डॉक्टर, अपने खजाने कि चाभी दे दे नहीं तो तेरी लाश बिच्छा दूँगा।" मैं बिल्कुल डरा नाना के पीछे खड़ा रहता और सोचता कि सचमुच यह नाना को मार देगा क्या? इसके बाद सुल्ताना और प्रधान मेरे नाना के पैर छु प्रणाम करते और पास वाले कमरे में रंगीन शराब पीने चले जाते।
ऐसा होता था daudnagar का जितिया। अब दस दिनों का यह आयोजन तीन चार दिनों में सिमट गया है। हाँ स्त्रियाँ अन्तिम दिन ओखली कि पूजा बिना किसी समस्या से कर सकें इसके लिए मोहल्ले के नक्कल लाल परी और कला परी बनकर उनके साथ रहते है। अब तो सुना है कि टीवी वाले भी इसका प्रसारण करते हैं।

सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

daudnagar का sarai


daudnagar मुग़ल शाषण के दौरान एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक केन्द्र होने के साथ साथ, पटना और बनारस के बीच होने के कारण और ग्रैंड ट्रंक रोड के नजदीक होने के कारण परिवहन के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण था। चूँकि यह गया के करीब है और गया एक तीर्थ स्थान (पूर्वजों को पिंड देने का स्थान) था, इस रास्ते से काफी तीर्थ यात्री भी आया जाया करते थे। ठगी और लूट को हम नजरंदाज नहीं कर सकते। इसलिए daudnagar के इलाके में जान माल की सुरक्षा एक जरूरी शासकीय मुद्दा था। इसीलिए daudnagar में daudkhan ने एक बड़ा sarai बनवाया।
२००६ में प्रकाशित किताब INDIA BEFORE EUROPE (Cambridge यूनिवर्सिटी प्रेस) में daudnagar के sarai का उल्लेख मिलता है। इस sarai को daudkhan ने 1659 se 1664 के बीच बनवाया । Daud khan Kureshi बिहार में मुग़ल governor था और इस इलाके में उसने एक स्थानीय जमींदार को हराया जो मुग़ल शाषण के खिलाफ था। अब तो इस sarai के दरवाजों के अवशेष बचें हैं । पहले यह sarai चारों तरफ़ से दीवारों से घिरा था और इसके दरवाजे रात को बंद रहते थे। मैंने पहले ब्लॉग पर लिखा है की daudnagar में एक मोहल्ले का नाम है पटना का फाटक जो पहले एक दरवाजा जो पटना की दिशा में खुलता था, हुआ होगा। sarai के अन्दर पूजा के लिए मन्दिर और मस्जिद भी थे। चारों तरफ़ छोटे छोटे कमरे थे जैसे आधुनिक होटल के कमरे। बीच के खुले बड़े जगह पर मवेशी और व्यापारिक चीजों को रखने की जगह थी।
इस sarai को लोग daudkhan का किला मानते हैं। अगर यह किला है तो sarai कहाँ गया। daudnagar में अभी भी एक sarai रोड है मगर वहां ऐतिहासिक दृष्टि से ऐसा कुछ भी नहीं। वहां देशी शराब की भट्टी है और कुछ वैश्ययों के घर , तो यह एक बदनाम सड़क है। जो चित्र इतिहासकारों ने sarai का दिया है जिसे मैंने ऊपर दिया है वह लोगों की नजरों में daudkhan का किला है। शायद और भी शोध की जरूरत है।

शनिवार, 31 जनवरी 2009

daudnagar

daudnagar औरंगाबाद जिले का एक क़स्बा है। इसका नाम daud खान से आया जो मुग़ल समय अथवा सूरी राज में सेना का अधिकारी था। कस्बे के पुराने इलाके में एक किला है । इस कसबे में एक मोहल्ला है जिसका नाम है पटना का फाटक । इसका मतलब है कि इसका इलाका सुरक्षा के वास्ते घिरा हुआ था । मैंने ब्रिटिश gazette में पढ़ा कि यह जगह दरी, पीतल के बर्तन और खेती के लिए मशहूर था। यहाँ मुनिसिपलिटी थी जो सौ सालों से भी पुरानी थी । कुछ सालों पहले जन गणना के मुताबिक इसका दर्जा मुनिसिपलिटी के लायक नहीं थी और यहाँ पंचायत समिति बन गई । ब्रिटिश शाषण के समय यहाँ नील (इंडिगो) और अफीम (ओपियम) के गोदाम थे । अभी भी यहाँ एक मोहल्ला है नील कोठी और अफीम कोठी ।। यहाँ का बाजार विकसित था । सोन नदी और गंगा नदी के बीच नहर बनाया गया था ब्रिटिश समय में जो यहाँ से गुजरता है । नहर से खेती विकसित हुई और कई जगह बिजली निकालने के लिए मिल लगे। इस बिजली से मेकनिकल काम किए जाते थे जैसे तिलहन से तेल निकालना अथवा गेहूं कि पिसाई । यहाँ के जनसँख्या में कुछ जातियों का ज्यादा संख्या में होना उनके पारंपरिक बाहुल्य को दर्शाता है जैसे कसेरा (कांसा या पीतल के बर्तन बनाने वाली जाती या पटवा जो मिटटी काटकर नहर बनाने थे) । ब्रिटिश समय में यहाँ शराब का गोदाम भी था। जब आजादी कि लड़ाई हुई तो लोगों नें गोदाम पर हमला किया । मेरी नानी बोलती थी कि कुछ लोगों ने १००% कांसन्त्रतेद शराब पी ली और मर गए। बाजार में विदेशी सामानों कि होली जलाई गयी । यह है कुछ शब्दों में daudnagar का परिचय ।

घोड़ा साईं

daudnagar में एक मजार है जहाँ हिंदू और मुसलमान समान श्रधा से जाते हैं । यहाँ दो मजार हैं । एक नवाब साहेब का है और दूसरा उनके घोड़े का । नवाब साहेब दुश्मनों का मुकाबला करते हुए घायल हो गए थे। उनका वफादार घोड़ा उनके शरीर को वापस शहर ले आया । घोड़ा भी घायल हो गया था। दोनों शहीद हो गए और दोनों का मजार दो जगहों पर स्थापित हैं । घोड़ा साईं का मजार काफी मशहूर है और हरेक साल यहाँ उर्स होता है । लोगों का मानना है की वे सभी मुरादें पूरी करते हैं। कुछ साल पहले मै जब वहां गया था तो एक हिंदू ने मुझसे पूजा कराई। घोड़ा साईं का मजार धर्म से ऊपर धार्मिक सद्भावना का प्रतीक है और एक यह प्रतीक है वफादारी का वह भी एक जानवर का जो लोगों की नजरों में भगवन है ।

बड़े बाबु

यह सच्ची कहानी मैंने अपने दोस्तों को सुनाया करता था । बड़े बाबु एक बेरोजगार व्यक्ति थे । कायस्थ परिवार के थे इसलिए पढने लिखने का शौक था और जमीन थी तो शायद उन्होंने नौकरी की जरुरत नहीं समझी । चूँकि उनके पास समय ही समय था तो एक रूटीन में वो अपना समय बिताते थे। अखबार पद्गने का उनको शौक या नशा था । अखबार वो खरीदते नहीं थे । तक़रीबन दस बजे नाश्ता करके घर से निकलते और धीरे धीरे अपन वक्त काटते । कई जगह पड़ाव लगाकर आख़िर में नई शहर के बाजार में कामता के पान दुकान पर आते और देश दुनिया के ऊपर ( तब तक उन्ही की तरह कुछ रेगुलर लोग जो उसके दूकान पर उस समय बैठकी लगाते ) अपना विचार प्रकट कर वापस घर लौट जाते थे। उस समय बिहार में सिर्फ़ दो समाचार पत्र प्रकाशित होते थे , आर्यावर्त और प्रदीप । बड़े बाबु दोनों अख़बारों को काफ़ी डिटेल में पढ़ते थे शायद निविदा (टेंडर) पेज भी । मजे की बात तो यह थी की अपने कई पडाओं पर वो एक ही अखबार बार बार पढ़ते थे। शायद समय काटने के लिए यह जरुरी था । pahla पड़ाव था पंडित जी का घर । पंडित जी के यहाँ एक अखबार आता था और वह उनके दालान में उपलब्ध रहता था। शायद घर का कोई व्यक्ति पढ़े न पढ़े अखबार दालान की शोभा थी । बड़े बाबु की तरह कई लोग जो उनके यहाँ आते अखबार पढ़ते थे । पंडित जी काफ़ी बूढे हो चुके थे और आंखों की रौशनी जा चुकी थी। एक दिन की बात है बड़े बाबु रोज की तरह पंडित जी के यहाँ पहुँच गए और अखबार पढने लगे । पंडित जी झपकी ले रहे थे । थोडी कुछ देर बाद पंडित जी ने पूछा," का बड़ा बाबु , का समाचार है ? " बड़े बाबु ने कहा, " जी पंडित जी, अभी पढ़ी थी ।" थोडी देर बाद पंडित जी ने फिर पूछा, " का बड़ा बाबु कुछ समाचार तो बोला ।" बड़े बाबु ने फिर कहा, " जी पंडित जी अभी पढ़ी थी ।" थोड़ा समय और गुजरा और पंडित जी ने फिर पूछा " अरे बड़ा बाबु कुछ समाचार तो बतावा ।" बड़े बाबु ने फिर से कहा, " जी पंडित जी अबी पढ़ी थी कुछ होती तो बतैबी ।" पंडित जी के सब्र का काबू जैसे टूट गया । गुस्से से वे बड़े बाबु पर टूट पड़े ," एक घटा से पढ़ी था जे है से की सारा अखबार सादा है का ? "
बड़े बाबु चुपके से निकल लिए और अपने अगले पड़ाव पर वही अख़बार फिर से पढ़ना शुरू किया जैसे कीच हुआ न हो और जैसे उन्होंने उस दिन का अखबार पढ़ा ही न हो । उनके दिनचर्या में कोई फर्क न आया , हाँ दूसरे दिन से वो पंडित जी के दालान में नहीं दिखे।